यह एक ऐसी महागाथा है जहाँ कामवासना केवल एक प्यास नहीं, बल्कि सृष्टि की सबसे शक्तिशाली ऊर्जा है। यह कहानी है एक ऐसे अवतार की, जो देव और दैत्य के अंशों से जन्मा है। इस दुनिया में नायक अपनी अदम्य काम-शक्ति के माध्यम से 112 चक्रों का भेदन करता है और 114 चक्रों तक पहुंच जाता हैं। यहाँ सुंदर स्त्रियों का संसर्ग केवल आनंद मात्र नहीं, बल्कि कुंडलिनी जागरण और तत्वबोध का मार्ग है। हर मिलन के साथ दिव्य शक्तियों का उदय होता है, जो स्वर्ग, पाताल और ब्रह्म लोक की सीमाओं को हिला देता है। जहाँ एक ओर वासना का तांडव है, वहीं दूसरी ओर खत्म होते ब्रह्मांडों को बचाने के लिए महाभयंकर युद्ध और दैवीय तकनीकें हैं। यह शैतानी और दैवीय शक्तियों का एक ऐसा संगम है, जहाँ आत्मज्ञान की प्राप्ति चरम कामोत्तेजना और रक्तपात के बीच से होकर गुजरती है। क्या वह अपनी इस 'वासना' को 'परम चेतना' में बदलकर सृष्टि का अंत रोक पाएगा?
एपिसोड 1 - मृत्यु गूंज
ब्रह्मांड के किसी सुदूर कोने में स्थित मृत्यु गूंज नामक पहाड़ी एक ऐसे नरसंहार की गवाह बनने जा रही थी, जिसकी कल्पना मात्र से आत्मा कांप जाए। आसमान का रंग सामान्य नीला नहीं था, वह किसी गहरे जख्म की तरह बैंगनी और गाढ़ा काला हो चुका था। बादलों की बनावट ऐसी थी मानो अंतरिक्ष की नसों को किसी ने महाशक्तिशाली खंजर से काट दिया हो और उसका सारा काला, गाढ़ा खून वायुमंडल में रिसकर समा गया हो। यहाँ की हवा में एक अजीब सा भारीपन था, एक ऐसी सरसराहट जो कानों में किसी के फुसफुसाने जैसी लगती थी, जैसे सदियों से यहाँ दफन हजारों आत्माएं एक साथ सिसक रही हों। मृत्यु गूंज की मिट्टी का रंग गहरा लाल था। यह रंग कुदरती नहीं था, बल्कि सदियों से यहाँ बहे अनगिनत योद्धाओं, मासूमों और दानवों के खून का नतीजा था, जो अब सूखकर लोहे जैसा कठोर और ठंडा हो चुका था। पहाड़ी के शिखर पर नरक के अदृश्य द्वार जैसे पूरी तरह खुल चुके थे। निम्न श्रेणी के सैकड़ों शैतान वहाँ पागलपन की हद तक एक दूसरे के खून के प्यासे थे। उनके शरीरों से सड़ते हुए मांस की ऐसी तीव्र गंध आ रही थी कि हवा भी जहरीली हो गई थी। उनकी आँखें लाल, पीली और पूरी तरह काली थी, जो सिर्फ और सिर्फ विनाश की भूख को दर्शा रही थी। "काट डालो! इस दुनिया का कोई भी हिस्सा साबुत नहीं बचना चाहिए!" एक शैतान की दहाड़ गूंजी, जिसका आधा चेहरा कटा हुआ था। तलवारों के टकराने से निकलने वाली चिंगारियाँ उस अंधेरे को ऐसे चीर रही थी, जैसे काली रात में बिजली कौंध रही हो। हर वार के साथ किसी का हाथ कटकर गिरता, तो किसी का सिर काली ढलानों पर लुढ़कते हुए नीचे चला जाता। चीखें इतनी भयावह थी कि वे पहाड़ी के पत्थरों से टकराकर वापस लौट रही थी, जिससे समझ आ रहा था कि क्यों उस जगह का नाम मृत्यु गूंज था। परंतु, असली वीभत्सता तो पहाड़ी के नीचे उस बंजर मैदान में पसरी थी। वहाँ दर्जनों स्त्रियां जंजीरों में जकड़ी हुई तड़प रही थी। उनके रेशमी वस्त्र तार तार हो चुके थे और उनके गोरे शरीरों पर धूल, मिट्टी और खून की परतें जमी थी। पिशाचों का एक झुंड, जिनके दांत बाहर निकले हुए थे और नाखून किसी दरिंदे के पंजों जैसे लंबे और नुकीले थे, वे सब उन स्त्रियों पर टूट पड़े। एक विशाल पिशाच, जिसकी देह से काला धुआं निकल रहा था, उसने एक सुंदर स्त्री को बालों से पकड़कर जमीन पर पटका। "नहीं! मुझे छोड़ दो... मुझे मार डालो पर यह मत करो! नहीं, नहीं।" वह स्त्री गिड़गिड़ाने लगी, उसकी आंखों से आंसू बहकर गालों पर जमे खून को धोने लगे। पिशाच ने एक क्रूर अट्टहास किया। "मारने में वह मजा कहाँ, जो तुम्हारे इस पवित्र शरीर को अपवित्र करने में है सुंदरी।" उसने अपने भारी, खुरदरे पंजों से उस स्त्री के दोनों कोमल स्तनों को इतनी बेरहमी से दबोचा कि उसकी उंगलियां मांस को फाड़ते हुए अंदर तक धंस गईं। दर्द इतना तेज था कि उस स्त्री के गले से एक ऐसी चीख निकली जो शायद स्वर्ग तक पहुँचती, पर यहाँ उसे सुनने वाला कोई नहीं था। पिशाच की घिनौनी और भारी सांसें उस स्त्री के चेहरे पर महसूस हो रही थी। उसने अपनी पाशविक शक्ति के मद में उस स्त्री की योनि को बेरहमी से फाड़ते हुए अपना खुरदरा और काला लिंग उसके भीतर एक ही झटके में उतार दिया। "आह्ह्ह्ह्ह!" वह स्त्री एक बार जोर से झटकी। उसका शरीर खून से लथपथ हो गया। अत्यधिक पीड़ा, भय और उस पिशाच की जहरीली ऊर्जा के कारण उसका हृदय वह आघात सहन नहीं कर पाया। उसकी आँखों की पुतलियाँ धीरे धीरे ऊपर की ओर चढ़ गईं, शरीर पत्थर की तरह ठंडा पड़ गया और उसने वहीं दम तोड़ दिया। लेकिन वह दरिंदा नहीं रुका। वह उस मृत देह पर भी अपनी हवस की भूख मिटाता रहा। आसपास यही मंजर था। कहीं कोई स्तन नोंचा जा रहा था, कहीं किसी की जांघें फाड़ी जा रही थी। चीखें, सिसकियां और मांस के फटने की वह चपचप वाली आवाजें मिलकर एक ऐसा वीभत्स संगीत पैदा कर रही थी, जिसे सुनकर शैतान भी अपनी आँखें फेर लें। तभी अचानक, वह सारा कोलाहल एक पल में थम गया। जैसे किसी ने पूरे ब्रह्मांड का पॉज बटन दबा दिया हो। ऊपर आसमान में एक ऐसी हलचल हुई जो आज तक किसी ने नहीं देखी थी। नीली और लाल बिजली के भयानक कड़कने से पूरा अंतरिक्ष कांप उठा। बादलों के बीच से एक धुंधला सा साया नीचे की ओर उतरता हुआ दिखाई दिया। वह साया हवा में ऐसे चल रहा था जैसे अदृश्य कांच की सीढ़ियों पर कदम रख रहा हो। उसका चेहरा एक रहस्यमयी नकाब से ढका था, पर उसकी आँखों से निकलता नीला प्रकाश अंधेरे को चीर रहा था। उसकी उपस्थिति मात्र से हवा का तापमान इतना गिर गया कि वहाँ गिर रहा खून जमने लगा। साये ने नीचे का वीभत्स दृश्य देखा। जिससे उसकी मुट्ठियाँ भिंच गईं। उसने धीरे से अपना दाहिना हाथ हवा में लहराया और एक मंत्र बुदबुदाया। फिर पलक झपकते ही, जो शैतान ऊपर युद्ध कर रहे थे और जो पिशाच उन बेबस स्त्रियों के शरीरों के साथ खेल रहे थे, वे सब के सब एक नीली ज्वाला में लिपट गए और एक ही सेकंड में सब राख के ढेर में बदल गए। कोई चीख नहीं, कोई संघर्ष नहीं, बस एक खामोश, ठंडा अंत। यह देखकर वह साया सिर हिलाकर आगे बढ़ा और ज़मीन पर उतरने लगा, लेकिन जैसे ही उसके पैर जमीन को छूने वाले थे, धरती किसी भूकंप की तरह फटने लगी। और देखते ही देखते उसके चारों ओर की जगह अचानक एक पारदर्शी बर्फ की तरह जम गई। समय जैसे उस घेरे के भीतर कैद हो गया था। अगले ही पल, फटी हुई धरती के अंदर से लावे की तरह दहकती हुई लाल जंजीरें निकली। देखने में वे साधारण जंजीरें नहीं थी क्योंकि उन्हें नरक पाश कहा जाता था, जिन्हें अरबों सालों की तपस्या और काली शक्तियों से तैयार किया जा सकता था। उन जंजीरों ने उस साये के हाथों, पैरों और गर्दन को बुरी तरह जकड़ लिया। वह अपनी पूरी ताकत लगाकर उन्हें तोड़ने की कोशिश करने लगा। उसके शरीर से निकलने वाली नीली आभा उन लाल जंजीरों से टकराकर भयानक चिंगारियां पैदा कर रही थी, जिससे आसपास की चट्टानें पिघलने लगी। पर वे जंजीरें जितनी ताकत से खींची जाती, उतनी ही गहराई से उसके मांस में धंसती जाती। उसी क्षण, अंतरिक्ष के ठीक बीचों बीच एक दरार पैदा हुई, जो सुनहरी रोशनी से लथपथ थी। उस आयामी दरार से एक छोटा बच्चा बाहर निकला। उसका चेहरा अत्यंत कोमल और मासूम था, लेकिन उसकी आँखों में एक ऐसी गहराई थी जैसे वह पूरी दुनिया का ज्ञान लेकर जन्मा हो। "पिताजी!" वह बच्चा चिल्लाया। अपने पिता को संकट में देख, वह नन्हा बच्चा बिना कुछ सोचे समझे उस सुरक्षा घेरे की ओर भागा। वह मासूम नहीं जानता था कि वह एक महामाया का जाल था। जैसे ही उसने उन लाल जंजीरों को छूने की कोशिश की, उसे एक भयानक बिजली का झटका लगा और वह भी उस ऊर्जा के भंवर में फंस गया। "देवांत! नहीं! तुमने यह क्या किया?" उस साया की आवाज, जो हमेशा चट्टान की तरह स्थिर रहती थी, आज पहली बार डर और बेबसी से कांप रही थी। "वापिस लौट जाओ मेरे बच्चे! वापिस लौट जाओ। यहाँ के आयाम तुम्हारे कोमल शरीर के लिए नहीं हैं। यह मृत्यु गूंज है, यहाँ की हवा में गद्दारी और मौत का जहर घुला है। तुरंत उस दरार में वापस जाओ देवांत, जल्दी जाओ!" उस साये की बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि बादलों के पार से एक ऐसी अट्टहास गूंजी जिसे सुनकर पत्थर भी फट जाएं, "हाहाहाहा... असुमान्त! महान रक्षक असुमान्त! हाहाहाहाहाहा, तुमने क्या सोचा था? कि तुम हमारे सदियों के खेल को एक हाथ के इशारे से बिगाड़ दोगे और हम तुम्हें स्वर्ग जाने देंगे? नहीं असुमान्त, कभी नहीं। तुम यहीं इस नरक में रहोगें और यहीं मरोगें।" वह आवाज इतनी भारी थी कि ऐसा लग रहा था मानो कोई पहाड़ बोल रहा हो। "आज तुमने इस पवित्र वध भूमि पर कदम रखकर अपनी मौत के दस्तावेज पर खुद दस्तखत की हैं। आज यहाँ सिर्फ तुम ही नहीं मरोगे असुमान्त.. बल्कि तुम्हारे इस तथाकथित दिव्य कुल का अंतिम अंश, यह छोटा सा कीड़ा भी हमारे पैरों तले कुचला जाएगा। हाहाहाहा!" उस आवाज में छिपी नफरत इतनी प्राचीन और गहरी थी कि असुमान्त तुरंत समझ गया यह कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित षड्यंत्र था। उसे यहाँ फंसाया गया था। यह समझ आते ही उसने अपनी आँखें तुरंत बंद की और अपने हृदय के भीतर गहराई में बंद अष्ट महाशक्तियों का आह्वान किया। असुमान्त के शरीर से एक नीला और सफेद विस्फोट हुआ। वह ऊर्जा इतनी शक्तिशाली थी कि लावे की वे जंजीरें पल भर के लिए ढीली पड़ गई और पूरी तरह टूट गई। ये देख कर असुमान्त ने समय नहीं गंवाया। उसने अपनी बची हुई सारी ऊर्जा को एक गोले में समेटा और उसे देवांत की ओर धकेल दिया। उस ऊर्जा ने देवांत को एक सुरक्षित घेरे में लिया और उसे जोर से धक्का देकर वापस उस सुनहरे आयामी दरार के पार फेंक दिया। "जिंदा रहना देवांत... याद रखना, जो कुछ भी तुमने यहाँ देखा, उसे अपनी शक्ति बनाना! चाहे कुछ भी हो जाए, कभी पीछे मुड़कर मत देखना!" असुमान्त की यह आखिरी चेतावनी ब्रह्मांड की गहराइयों तक गूंज गई। जैसे ही वह सुनहरी दरार बंद हुई, असुमान्त अकेला रह गया। उसने अपनी पीठ से एक विशाल, चमकती हुई तलवार निकाली। तलवार कसकर पकड़ने के बाद, वह उस रहस्यमयी आवाज की दिशा में पूरी रफ्तार से भागा। लेकिन मुश्किल से दस कदम चलने के बाद वह अचानक ठिठक गया। उसे महसूस हुआ कि उसके चारों ओर का वातावरण बदल गया था। कुछ समझते हुए असुमान्त ने एक गहरी और लंबी सांस ली, फिर अपनी तलवार पर और मजबूत पकड़ बनाकर शांत स्वर में बोला, "अब कायरो की तरह इस धुंध के पीछे छिपकर वार करना बंद करो। सामने आओ गद्दारों! मैं तुम्हारी सड़ांध पहचानता हूँ।" वह थोड़ा रुका और फिर तिरस्कार के साथ बोला, "हुँह... तो ये तुम हो असुर वासदैत्य! जिसके बारे में कहा जाता है कि तुम्हारे पास हजारों दैत्यों का बल है और तुम्हारी रगों में वासना का लावा बहता है। और तुम्हारे साथ नागलोक की सबसे कलंकित हवस भरी नागरानी शिल्या भी है, जिसकी एक विषैली फुफकार पूरे के पूरे पहाड़ों को भाप बनाकर उड़ा सकती है। ये क्या... ड्रैगन शानवीर भी आ गया? वह माया की देवी, मल्लिका अंजानी भी? और सबसे बड़ा कलंक, वह गद्दार देव, शाही दैतामान भी यहाँ मौजूद है?" जैसे ही असुमान्त ने यह नाम लिए, अंधेरे के पांच कोनों से पांच भयानक साये बाहर निकल आए। बाहर आते ही उन्होंने असुमान्त को पूरी तरह से घेर लिया। वासदैत्य का शरीर किसी छोटे पहाड़ जैसा विशाल और पूरी तरह काला था। उसके हाथ में एक ऐसी गदा थी जो हजारों इंसानी खोपड़ियों को पिघलाकर बनाई गई थी। नागरानी शिल्या का आधा शरीर स्त्री का था जो अत्यंत कामुक और सुंदर था क्योंकि वह पूरी तरह नग्न थी, पर कमर के नीचे वह एक विशालकाय काले नाग के रूप में थी। वह अपनी द्विजिह्वा लपलपाते हुए असुमान्त को ऐसी नजरों से देख रही थी जैसे उसे कच्चा चबा जाएगी। मल्लिका अंजानी के चारों ओर एक गुलाबी और बैंगनी धुंध थी जो किसी को भी पागल कर सकती थी। ड्रैगन शानवीर के नथुनों से हर सांस के साथ नीली आग निकल रही थी। और अंत में, शाही दैतामान, जिसके हाथ में सुनहरी और काली शक्तियों से बना एक विशाल भाला था। वे सभी जानलेवा नज़रों से असुमान्त को घूरते जा रहें थे। "आज तुम्हारी ये सारी हेकड़ी इसी मिट्टी में मिल जाएगी असुमान्त!" शाही दैतामान ने अपना भाला असुमान्त की ओर तानते हुए कहा। शाही दैतामान के कहें इन शब्दों को सुनकर भी असुमान्त अपनी तलवार, जिसे नील वज्र कहा जाता था, उसे मजबूती से पकड़े खड़ा था। उसकी नीली आँखों में डर का नामोनिशान नहीं था, पर उसे पता था कि आज का सूरज उसके लिए शायद ही उगे। "असुमान्त!" वासदैत्य की आवाज ऐसी थी जैसे दो पहाड़ आपस में रगड़ खा रहे हो। उसने अपनी खोपड़ियों वाली गदा को जमीन पर पटका, जिससे पूरी पहाड़ी किसी खिलौने की तरह हिल गई। "तूने बहुत लंबे समय तक ब्रह्मांड के संतुलन का ढोंग किया है। लेकिन आज, आज इस मृत्यु गूंज पर तेरी नैतिकता और तेरी शक्तियाँ दोनों हमारी हवस और ताकत के नीचे कुचल दी जाएंगी। देख, तेरे चारों ओर कौन खड़ा है! मौत खुद तुझे घेर कर खड़ी है असुमान्त, हाहाहाहाहाहा।"इसी बीच नागरानी शिल्या अपनी पूंछ को जमीन पर पटकते हुए आगे बढ़ी। उसका ऊपरी हिस्सा किसी अप्सरा जैसा सुंदर था, पर उसकी आँखों में सांपों जैसी ठंडक और क्रूरता थी। उसने अपनी लाल जुबान लपलपाते हुए फुसफुसाया, "असुमान्त... इतनी सुंदर काया... इतना शक्तिशाली दिव्य पुरुष। काश! तू हमारा साथ देता, तो आज मैं तेरे इस दिव्य शरीर का रस पीती। पर अफ़सोस, आज तेरा खून इसी बंजर मिट्टी की प्यास बुझाएगा।" असुमान्त ने एक ठंडी हंसी हंसी। "हह, हवस की रानी नागरानी शिल्या, तुम्हारी फुफकार में जहर तो बहुत है, पर तुम्हारी बातें केवल कायरों को डरा सकती हैं मुझे नहीं। और तुम, शाही दैतामान? एक देव होकर इन दैत्यों के तलवे चाट रहे हो? क्या स्वर्ग की पवित्रता तुम्हें इतनी चुभने लगी थी कि तुमने पाताल का कीचड़ अपने माथे पर लगा लिया?" शाही दैतामान, जिसने सुनहरी और काली शक्तियों का एक विशाल भाला पकड़ा था, उसकी आँखों में नफरत की ज्वाला धधक उठी। "पवित्रता? वह पवित्रता केवल एक बंधन थी असुमान्त! इन दैत्यों के साथ मिलकर मैंने वह शक्ति पाई है जो त्रिदेवों के पास भी नहीं है। आज तू मरेगा, और कल हम ब्रह्म लोक पर अपना झंडा गाड़ेंगे!" इसके तुरंत बाद बिना किसी और चेतावनी के, युद्ध शुरू हो गया। सबसे पहले ड्रैगन शानवीर ने अपने पंख फैलाए और उसके नथुनों से गहरे नीले रंग की आग का एक विशाल गोला असुमान्त की ओर बढ़ा। वह आग इतनी गर्म थी कि उससे हवा के अणु तक जलने लगे। असुमान्त ने अपनी नील वज्र तलवार को हवा में घुमाया और चिल्लाया, "अदृश्य गति शून्य विच्छेद!" फिर एक पल में असुमान्त अपनी जगह से गायब हो गया। जिससे वह आग का गोला उस स्थान से टकराया जहाँ वह एक पल पहले खड़ा था, और वहां की चट्टानें तुरंत लावे में बदल गई। अगले ही पल, असुमान्त शानवीर के ठीक ऊपर दिखाई दिया। उसकी तलवार से नीली रोशनी की एक विशाल लहर निकली, जिसने उस आग के गोले को बीच से ऐसे काट दिया जैसे कोई कागज का टुकड़ा हो। वासदैत्य गरजा, "अभी तो शुरु हुआ है तुम्हारी मौत का खेल असुमान्त!" वासदैत्य ने अपनी भारी गदा हवा में लहराई। जिससे उस गदा के चारों ओर काले धुएं का एक बवंडर बन गया। जब वह गदा असुमान्त की तलवार से टकराई, तो एक ऐसा धमाका हुआ जिसकी गूंज मीलों दूर तक पहुंच गई। आसपास के पहाड़ों में दरारें पड़ने लगी। उनकी शक्तियों की टक्कर से दैवीय, शैतानी और जहरीली शक्तियों का एक ऐसा तूफान खड़ा हो गया था कि आकाश के बादल भी तितर बितर हो गए। असुमान्त अकेला था, पर उसका प्रहार किसी महाप्रलय से कम नहीं था। उसने अपनी तलवार को जमीन में गाड़ा और एक अजीब मंत्र पढ़ा। जिससे अचानक जमीन से नीली बिजली की हजारों धाराएं निकली और उन पांचों की ओर बढ़ीं। यह असुमान्त की ब्रह्मांडीय वज्र तकनीक थी। "हुँह, क्या छोटी मोटी चालें है।" मल्लिका अंजानी ने मधुर स्वर में कहा, पर उसके हाथ तेजी से मुद्राएं बना रहे थे। उसने अपनी मायावी शक्ति से एक गुलाबी धुंध फैलाई जिसने उन बिजलियों को सोख लिया। "असुमान्त, तुम अपनी आँखों पर बहुत भरोसा करते हो, है ना? क्या होगा अगर तुम्हारी आँखें ही तुम्हें धोखा देने लगें?" असुमान्त को महसूस हुआ कि उसका शरीर अचानक से भारी होने लगा है। दूर से ये देखते ही नागरानी शिल्या ने मौका पाकर अपनी पूंछ से असुमान्त के पैरों को जकड़ने की कोशिश की, पर असुमान्त ने हवा में छलांग लगाई और अपनी शून्य प्रहार तकनीक का इस्तेमाल किया। उसने अपनी तलवार से एक सीधा वार शाही दैतामान पर किया। शाही दैतामान ने अपने भाले से उसे रोकने की कोशिश की, पर असुमान्त की शक्ति इस समय अपने चरम पर थी। जब शाही दैतामान के भाले से असुमान्त का हमला टकराया, तो उस टक्कर से एक भयानक धातु की आवाज आई और
शाही दैतामान का अभेद्य कवच, जिसे देवताओं ने बनाया था, असुमान्त की तलवार के एक ही झटके में चकनाचूर हो गया। एक बेहद तेज़ झटके से दैतामान पीछे की ओर गिर पड़ा, उसके सीने से सुनहरा और काला खून रिसने लगा। "असंभव! ये हो ही नहीं सकता।" दैतामान कराहते हुए बोला। "अकेला एक योद्धा हम पांचों पर भारी पड़ रहा है? ये कैसे संभव है।" युद्ध अब खूनी मोड़ ले चुका था। असुमान्त की गति इतनी तेज थी कि वह एक साथ पांचों स्थानों पर दिखाई दे रहा था। शानवीर की आग, शिल्या का जहर और वासदैत्य का बल, उन पांचों को असुमान्त आसानी से मात दे रहा था। ऐसा लग रहा था मानो वह इस नामुमकिन जंग को जीत लेगा। उसके चेहरे पर एक संकल्प था, अपने बेटे देवांत के लिए समय खरीदना। मगर वहीं थोड़ी दूरी पर हवा में तैरती मल्लिका अंजानी की आँखों में एक कुटिल चमक आ गई। उसने अपनी दोनों हथेलियाँ मिलाई और एक प्राचीन मायावी मंत्र फूंका। असुमान्त जो अभी वासदैत्य पर अंतिम प्रहार करने वाला था, अचानक रुक गया। उसके सामने का दृश्य बदल गया। उसे लगा कि वह युद्ध के मैदान में नहीं, बल्कि उसी आयामी दरार के पास खड़ा था। और वहां, उसका बेटा देवांत लहूलुहान पड़ा था। "पिताजी... बचाइए मुझे! ये लोग मुझे मार रहे हैं!" देवांत की चीख असुमान्त के कानों में गूंजी। ये सुनते ही असुमान्त का दिल दहल गया। "देवांत! बेटा तुम यहाँ, ये क्या हो गया देवांत!" उसने अपनी तलवार पर पकड़ ढीली कर दी और अपने बेटे देवांत की ओर बढ़ा। "नहीं! मैंने तो तुम्हें सुरक्षित भेज दिया था बेटा! यह कैसे हुआ?" इस समय युद्ध से असुमान्त का ध्यान केवल एक क्षण के लिए भटक गया था, पर युद्ध के इस स्तर पर एक क्षण ही नियति तय करने के लिए काफी था।
"अब तेरा अंत निश्चित है असुमान्त!" वासदैत्य चिल्लाया। उसने अपनी पूरी ताकत लगाकर अपनी विशाल गदा असुमान्त की पीठ पर दे मारी। जिससे असुमान्त की रीढ़ की हड्डी के टूटने की आवाज साफ सुनाई दी। वह जोर से आगे की ओर गिर पड़ा। इससे पहले कि वह संभल पाता, नागरानी शिल्या बिजली की गति से आगे बढ़ी। उसने असुमान्त के शरीर को अपनी विशाल पूंछ से जकड़ लिया और अपनी गर्दन को लंबा करते हुए अपने दो इंच लंबे, जहरीले दांत सीधे उस की गर्दन की नस में गाड़ दिए। "आह्ह्ह्ह्ह्ह!" असुमान्त की एक दर्दनाक चीख निकली। तेज़ से शिल्या का कालकूट जहर असुमान्त की नसों में फैलने लगा। असुमान्त की नीली आभा, जो अब तक अंधेरे को चीर रही थी, धीरे धीरे मद्धम पड़ने लगी। उसकी आँखों की चमक बुझने लगी। इतने में शाही दैतामान ने अपना भाला उठाया और उसे असुमान्त के पेट के आर पार कर दिया। असुमान्त घुटनों के बल गिर पड़ा। उसके मुंह से खून का फव्वारा फूटा, जो मृत्यु गूंज की लाल मिट्टी में मिलकर उसे और गहरा बना गया। वह कांप रहा था, उसका शरीर अब उसकी आज्ञा नहीं मान रहा था। वासदैत्य उसके करीब आया और उसके बाल पकड़कर उसका सिर ऊपर उठाया। "देखा असुमान्त? तेरा प्रेम ही तेरी कमजोरी बना। अगर तू उस बच्चे के मोह में न पड़ता, तो शायद तू हमें थोड़ी और कड़ी टक्कर देता या फिर मार देता। पर अब... अब तू सिर्फ एक इतिहास है, एक ऐसा योद्धा, जो ना देवता बन सका, ना दानव, हाहाहाहाहाहा।" इस दौरान असुमान्त की सांसें उखड़ रही थी। उसने धुंधली आँखों से उस दिशा में देखा जहाँ उसने देवांत को भेजा था। उसके होंठों पर एक क्षीण सी मुस्कान आई। उसे पता था कि जिसे ये लोग भ्रम समझ रहे थे, उसने उस बच्चे के भीतर कुछ ऐसा बो दिया था जो इन पांचों की दुनिया उजाड़ देगा। असुमान्त का शरीर अब नीले प्रकाश के छोटे छोटे कणों में टूटने लगा था। यह एक ऐसे महान योद्धा का अंत था, जो ना पूरी तरह दानव था न देवता। देखते ही देखते असुमान्त का शरीर टुकड़ों में बंट गया और हवा में विलीन हो गया। पीछे रह गई तो केवल उसकी नील वज्र तलवार, जो अब बेजान होकर मिट्टी में धंसी थी। वासदैत्य ने एक जोरदार अट्टहास किया जो सात लोकों तक गूंजा। "हाहाहाहाहाहा" फिर वह एक घौर अंधेरे की ओर देख कर गरजा, "असुमान्त का खेल खत्म हुआ! अब उस बच्चे की बारी है। वह जहाँ भी गया है, उसे खोज निकालो! असुमान्त के कुल का एक भी कतरा जिंदा नहीं रहना चाहिए! जाओ, मार डालो उस बच्चे को।" वासदैत्य के इतना कहते ही आसमान में एक बेहद क्रूर और भयानक हंसी गूंजी। लेकिन वे पांचों यह नहीं जानते थे कि असुमान्त ने मरते मरते एक ऐसी शक्ति को जन्म दे दिया था, जिसका सामना करने की औकात न तो स्वर्ग के देवताओं में थी और न ही पाताल के दैत्यों में। सुनहरे आयाम के उस पार गया वह छोटा बच्चा देवांत अब कहाँ था? क्या वह वाकई एक साधारण व्यक्ति बनकर जीवन बिताएगा, या उसके भीतर सोई हुई वह रहस्यमयी शक्ति जब जागृत होगी, तब क्या वह उन पांचों के खून से अपना अभिषेक करेगा? ब्रह्मांड के इस अंधकारमय कोने में जो हुआ, वह केवल एक अंत नहीं था, बल्कि एक महाविनाशकारी शुरुआत थी। भविष्य के गर्भ में क्या छुपा है? क्या देवांत अपनी पहचान जान पाएगा? और जब उसे पता चलेगा कि उसके पिता की मृत्यु के पीछे किन शक्तियों का हाथ था, तो क्या वह देव बनेगा या दैत्य?